गंगा नदी में बढ़ते प्रदूषण पर NGT की फटकार, कहा ‘‘प्रभावी तरीके से शायद ही कुछ किया गया”

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गंगा बढ़ते प्रदूषण पर उत्तराखंड सरकार को एनजीटी की फटकार
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राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने गंगा की सफाई के लिए उत्तराखंड सरकार की ओर से उठाए गए कदमों पर असंतोष व्यक्त किया है. एनजीटी ने कहा कि हालात असाधारण रूप से खराब हैं और नदी की सफाई के लिए शायद ही कुछ किया गया है. एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति ए के गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि स्थिति में सुधार के लिए नियमित निगरानी की जरूरत है, अधिकारियों के दावों के बावजूद गंगा के पुनर्जीवन के लिए जमीनी स्तर पर किए गए काम पर्याप्त नहीं हैं.

एनजीटी ने आदेश दिए कि गंगा में प्रदूषण के बारे में जमीनी स्तर पर लोगों की राय जानने के लिए सर्वेक्षण कराया जाए. संबंधित अधिकारियों को यह राय ई-मेल के जरिए भेजी जा सकती है. न्यायमूर्ति गोयल ने कहा, ‘‘शायद ही प्रभावी तरीके से कुछ किया गया है. क्या आपने जाकर इलाके को देखा है? मैं गया हूं और वहां निर्माण कार्य चल रहे हैं. यह मुश्किल स्थिति है, लेकिन मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता कि कुछ किया गया है. मैं नहीं कर सकता. हालात असाधारण रूप से खराब हैं.’’

न्यायमूर्ति जवाद रहीम और आर.एस. राठौड़ की सदस्यता वाली पीठ ने कहा, ‘‘यह देश की सबसे प्रतिष्ठित नदी है जिसका सम्मान 100 करोड़ लोग करते हैं, लेकिन हम इसका संरक्षण नहीं कर पा रहे. व्यवस्था को ज्यादा से ज्यादा ठोस और प्रभावी बनाने की जरूरत है.’’ पीठ ने कहा, ‘‘हम यहां आम आदमी के लिए हैं. सड़कों पर जाएं और देखें कि जमीनी स्थिति को लेकर उनमें कितनी निराशा है.’’ उन्होंने कहा पिछले दो साल में उसके समक्ष नौ स्थिति रिपोर्टें दाखिल की जा चुकी हैं लेकिन नतीजे शायद ही जमीन पर दिख रहे हैं.

एनजीटी ने कार्यकारी समितियों को आदेश दिए कि वे हर महीने नदी से पानी के नमूने लेकर उनका परीक्षण करें. एनजीटी ने हर जिले में जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में बनी गंगा समितियों को निर्देश दिया कि वे अधिकरण की ओर से गठित कार्यकारी समिति को हर पखवाड़े रिपोर्ट सौंप कर बताए कि निर्देशों पर अमल के लिए कौन से कदम उठाए जा रहे हैं. पीठ ने कहा, ‘‘आदेशों के पालन से जुड़े हलफनामे में दावा किया जा सकता है कि सारे कदम उठाए गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर निर्देशों पर अमल पर्याप्त नहीं है. यह स्वीकार करना संभव नहीं है कि गंगा प्रदूषण मुक्त है.’’