गोरखपुर: सीएम योगी के शहर में डॉक्टर अपनी कार के लिए एक महीने से काट रहा सरकारी दफ्तरों के चक्कर

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गोरखपुर में डॉक्टर अपनी ही कार के लिए एक महीने से काट रहा सरकारी दफ्तरों के चक्कर
डॉक्टर राकेश संतानी की लिखित शिकायत

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने आईटी एक्ट 2000 का हवाला देते हुए ट्रैफिक पुलिस और राज्य के ट्रांसपोर्ट विभाग को निर्देश दिया है कि ड्रॉइविंग लाइसेंस, आरसी और इंश्योरेंस पेपर जैसे डॉक्यूमेंट को अब डिजिटल रुप में मंजूरी दी जाए. इन डॉक्यूमेंट का डिजिटल वर्जन डिजीलॉकर और एमपरिवहन एप पर उपलब्ध होगा. यानी गाड़ी के पेपर या लाइसेंस को अलग-अलग साथ रखने की जरुरत नहीं होगी. लेकिन मंत्रालय के इस फैसले का असर यूपी में योगिराज के अधिकारियो पर पड़ता नहीं दिख रहा. गोरखपुर में एक डॉक्टर अपनी कार को वापस पाने की कोशिस में बीते लगभग एक महीने से लगातार कोशिस कर रहा है लेकिन अधिकारियो के ढुलमुल रवैये के सामने वो बेबस है.


दरअसल सीएम योगी के शहर गोरखपुर में जटाशंकर चौराहे के पास रहने वाले पेशे से डॉक्टर राकेश संतानी की मारुती कार लगभग एक महीने पहले 24 जुलाई को जीडीए टावर की पार्किंग से पुलिस द्वारा उठा ली गयी. अपनी कार को वापस पाना डॉक्टर राकेश के लिए पहाड़ खोदने के बराबर साबित हो रहा है. डॉक्टर के मुताबिक बीते लगभग एक महीने से वह अपनी गाड़ी वापस पाने की कोशिस में लगे है, जिसके लिए उन्हें एक के बाद एक कई सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगवाए जा रहे है. डॉक्टर संतानी ने कहा कि जो काम सिर्फ एक sms से हो सकता है उसके लिए कानून के नाम पर उन्हें परेशान किया जा रहा है.

डॉक्टर राकेश जब अपनी समस्या लेकर सिटी मेजिस्ट्रेट विवेक कुमार श्रीवास्तव के पास पहुंचे तो उन्होंने भी उनकी मदद करने से इंकार कर दिया. डॉक्टर के मुताबिक उन्होंने अपनी गाड़ी के सभी कागजात और ऑनलाइन दस्तावेज तक सिटी मेजिस्ट्रेट को दिखाए लेकिन उन्होंने सभी को नकारते हुए उन्हें तीन अलग से सर्टिफिकेट बनवाने को कहा. डॉक्टर संतानी जब सारे कागजात तैयार करवाकर अपनी गाड़ी लेने पहुंचे तो आज एक महीने बाद भी उन्हें यह कहकर वापस कर दिया गया कि आज टाइपिंग बाबू नहीं आये है कल आना. डॉक्टर संतानी ने बताय कि ऐसे ही कल-कल करते हुए उन्हें एक महीने होने को आ गए है.

गौरतलब है कि सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय को कई शिकायतें और आरटीआई के तहत आवेदन मिले थे जिनमें कहा गया था कि ट्रैफिक पुलिस या ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट डिजिलॉकर या एमपरिवहन में उपलब्ध दस्तावेजों को वैलिड नहीं मानता है और कागजी फॉर्म में ये दस्तावेज न दिखाने पर चालान काट देता है, जिसके बाद मंत्रालय ने आज डॉक्यूमेंट का डिजिटल वर्जन को मंजूरी दी है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब सूबे के सीएम के शहर में ही पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी एक डॉक्टर जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति को लगभग एक महीने से उसकी गाड़ी के लिए दौड़ा रहे है तो आम जनता का क्या हाल किया जाता होगा?